Surdas Ke Pad Ke Arth सूरदास के पद के अर्थ

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पिछले पोस्टों में मैंने Rahim Ke Dohe Ke Arth और Surdas Ke Pad Questions & Answers शेयर किए हैं तो आप उसे भी चेक कर सकते हैं।

Surdas Ke Pad Ke Arth सूरदास के पद के अर्थ

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?…………………………हलधर की जोटी ।।

कवि सूरदास जी ने अपने इस पद में कान्हा जी के बचपन की एक लीला का वर्णन किया है। इसके अनुसार, यशोदा माता कान्हा को दूध पिलाने के लिए कहती हैं कि इससे उनकी छोटी-सी चोटी, लंबी और मोटी हो जाएगी। कान्हा इसी विश्वास में काफी दिन दूध पीते रहते हैं। एक दिन उन्हें ध्यान आता है कि उनकी चोटी तो बढ़ ही नहीं रही है। तब वो यशोदा माँ से कहते हैं, माँ मेरी चोटी कब बढ़ेगी? मुझे दूध पीते हुए इतना समय हो गया है, लेकिन ये तो अब भी छोटी ही है। आपने तो कहा था कि दूध पीने से मेरी चोटी किसी बेल की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी। फिर उसे कंघी से काढ़ा जाएगा, गूंथा जाएगा, फिर नहाते समय वो किसी नागिन की तरह लहराएगी। फिर कान्हा अपनी माँ से शिकायत करते हैं कि उन्होंने चोटी बढ़ाने का लालच देकर उन्हें कच्चा दूध पिलाया है, जबकि उन्हें तो माखन-रोटी पसंद है। अंतिम पंक्ति में कवि सूरदास कान्हा और बलराम की जोड़ी की ओर मुग्ध होकर उनकी लंबी उम्र की कामना करते हैं कि ऐसी सुंदर लीला दिखाने वाले दोनों भाई कृष्ण और बलराम की जोड़ी बनी रहे।

सोभित कर नवनीत लिए…………………………का सत कल्प जिए।।

प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सूरदास जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और आँगन में घुटनों के बल ही चल पाते हैं। एक दिन उन्होंने ताजा निकाला हुआ माखन एक हाथ में लिया और लीला करने लगे। श्रीकृष्ण के एक हाथ में माखन शोभायमान है और वह उस माखन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं। उनके शरीर पर रेनु यानी धूल लगी है। मुख पर दही लिपटा है, उनके कपोल यानी गाल सुंदर तथा नेत्र चपल हैं। ललाट यानी माथे पर गोरोचन का तिलक लगा है। बालकृष्ण के बाल घुँघराले हैं। जब वह घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुँघराले बालों की लटें उनके गाल पर झूमने लगती हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भँवरे मीठा रस पीकर मतवाले हो गए हैं। उनके इस सौंदर्य की शोभा उनके गले में पड़े कंठहार व सिंह नख से और बढ़ जाती है। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाए तो जीवन सार्थक हो जाए। अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक ही है।

Surdas Ke Pad Ke Arth सूरदास के पद के अर्थ

बूझत स्याम कौन तू गौरी…………………………भुरइ राधिका भोरी।।

सूरदास जी ने राधा से कृष्ण के प्रथम मिलन का इस पद में वर्णन किया है। श्रीकृष्ण ने पूछा कि हे गोरी! तुम कौन हो? कहाँ रहती हो? किसकी पुत्री हो? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हें नहीं देखा। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आँगन में खेलती रहतीं। इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन की चोरी करता फिरता है। तब कृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा, हम मिल-जुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार रसिक कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया।

मैया मैं नहिं माखन…………………………लै उर कंठ लगायो।।

कृष्ण जी कहते हैं कि मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। तुम मुझे सुबह होते ही गायों के पीछे मधुबन भेज देती हो। चार पहर भटकने के बाद साँझ होने पर मैं वापस आता हूँ। मैं छोटा बालक हूँ, मेरी बाहें भी छोटी हैं, मैं छीकें तक भी नहीं पहुँच सकता हूँ। यह सब सखा मुझसे दुश्मनी रखते हैं, इन्होंने मक्खन जबरन मेरे मुख में लपेट दिया है। माँ तू मन की बड़ी भोली है, इसीलिए इनकी बातों में आ गई। माँ तेरे दिल में ज़रूर कोई राज़ है, जो मुझे पराया समझकर मुझ पर संदेह कर रही हो। यह लो अपनी लाठी और कंबल। तुमने मुझे बहुत नाच नचा लिया है। इस प्रकार कृष्ण जी रूठने का नाटक करके माता यशोदा को अपनी बातों से मोहित कर लेते हैं और माता यशोदा भी मुस्कुराकर कृष्ण को गले लगा लेती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु कृष्ण ने अपनी बातों से माता के मन को भी मोहित कर लिया।

तो ये थे Surdas Ke Pad Ke Arth सूरदास के पद के अर्थ।