Rahim Ke Dohe Ke Arth रहीम के दोहे के अर्थ

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Rahim Ke Dohe Ke Arth रहीम के दोहे के अर्थ

शब्दार्थ

  • मीत – साथी
  • साँचे – सच्चा
  • रीत – तरीका
  • संचहि – इकट्ठा करना
  • मोल – कीमत

दोहा – 1 

“कहि रहीम संपति सगे……………….सोई साँचे मीत।।”

रहीम कहते हैं कि यदि धन-संपत्ति हो, तो अनेक लोग सगे-संबंधी बन जाते हैं। पर सच्चे मित्र तो वे ही हैं जो विपत्ति की कसौटी पर कसे जाने पर खरे उतरते हैं। सोना सच्चा है या खोटा, इसकी परख घिसने से होती है। इसी प्रकार मुसीबत में जो हर तरह से साथ देता है, वही सच्चा मित्र है।

सच्चा मित्र वही है जो मुसीबत के समय काम आता है। इसलिए विपत्ति के समय अपने मित्र का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उसकी सहायता करने से भी हमारी मित्रता सार्थक सिद्ध होगी।

दोहा – 2
“रहिमन धागा प्रेम का………………..गाँठ परि जाय।।”

रहीम कहते हैं कि प्रेम का नाता नाज़ुक होता है। इसे झटका देकर तोड़ना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन हो जाता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागों के बीच में गाँठ पड़ जाती है।

हमें सभी रिश्तों को संभालकर रखना चाहिए क्योंकि प्रेम के धागे की तरह रिश्ते भी बहुत ही नाज़ुक होते हैं और एक बार टूटने पर इसमें गाँठ पड़ जाती है। फिर चाहे हम जितनी कोशिश कर लें वह गाँठ रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।

Rahim Ke Dohe Ke Arth रहीम के दोहे के अर्थ

दोहा – 3 
“बड़े बड़ाई ना…………….टका मेरौ मोल।।”

रहीम कहते हैं कि जो सचमुच बड़े होते हैं, वे अपनी बड़ाई नहीं किया करते, बड़े-बड़े बोल नहीं बोला करते। हीरा कभी नहीं कहता है कि उसका मोल लाख टके का है। मूल्यवान वस्तुओं की कीमत अपने आप ही हो जाती है।

हमें अपनी बड़ाई खुद से नहीं करनी चाहिए, सिर्फ़ कर्म करते जाना चाहिए। हमारे कर्मों से हमारी प्रशंसा पूरे संसार में अपने आप होगी।

दोहा – 4
“रहिमन देखि बड़ेन को,……………..कहा करै तरवारि।।”

रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु को फेंक नहीं देना चाहिए। जहाँ छोटी-सी सुई काम आती है, वहाँ तलवार का कोई काम नहीं है।

हमें कभी छोटे व्यक्तियों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए क्योंकि जो काम छोटी-सी सुई कर सकती है वह काम बड़ी तलवार भी नहीं कर पाती है। सुई जोड़ने का काम करती है और तलवार चीज़ों को अलग करने का। छोटी वस्तुओं का अपना महत्व होता है।

दोहा – 5 
रूठे सुजन मनाइए………………टूटे मुक्ताहार।।”

प्रस्तुत दोहे में रहीम ने एकता की भावना का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि अगर आपका कोई ख़ास सखा या रिश्तेदार आपसे नाराज़ हो गया है तो उसे मनाना चाहिए। अगर वो सौ बार रूठे तो सौ बार मनाना चाहिए क्योंकि रिश्ते मोती की भाँति ही कीमती होते हैं। कोई मोती की माला टूट जाती है तो सभी मोतियों को फिर से एकत्र कर उसे वापस धागे में पिरोया जाता है। रहीम के अनुसार इसी प्रकार का व्यवहार मनुष्य को अपने दोस्तों या परिवारजनों के साथ करना चाहिए। सभी रिश्तों को एक माला की तरह जोड़कर रखना चाहिए।

Rahim Ke Dohe Ke Arth रहीम के दोहे के अर्थ

दोहा – 6 
“त्यों रहीम जस होत………………मेहँदी को रंग।।”

रहीम कहते हैं वे मनुष्य धन्य हैं जिनके अंग दूसरों की भलाई करते हैं। जैसे मेहंदी का रंग बाँटनेवाले को अपने आप ही लग जाता है, उसी प्रकार दूसरों की भलाई करनेवाले का भला स्वयं ही हो जाता है। परोपकार करने वाले के संग रहने से व्यक्ति को अपने आप यश प्राप्त हो जाता है।

प्रस्तुत दोहे में रहीम परोपकार की भावना के बारे में समझाते हुए कहते हैं कि जो लोग दूसरों की भलाई करते हैं उनका भला स्वयं ही हो जाता है। ईश्वर हमेशा परोपकारी मनुष्य की सहायता करते हैं।

दोहा – 7  
”तरुवर फल नहिं खात……………..संपति सँचहिं सुजान।।”

रहीम कहते हैं वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं और सरोवर स्वयं अपना पानी नहीं पीता है। उसी तरह अच्छे और सज्जन व्यक्ति वे हैं जो अपनी संपत्ति दूसरों की भलाई करने के लिए संचित करते हैं।
परोपकारी मनुष्य अपने धन को अपने भोग-विलास में खर्च न करके जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए उपयोग में लाते हैं। वे सज्जन मनुष्य हैं।

दोहा – 8   
“रहिमन वे नर……………….मुख निकसत नाहिं।।”

रहीम कहते हैं जो व्यक्ति किसी से कुछ माँगने के लिए जाता है वो तो मरे हुए हैं क्योंकि उनका आत्मसम्मान मर चुका होता है परंतु उनसे भी पहले वे लोग मर जाते हैं जिनके मुँह से नहीं निकलता है।
माँगनेवाला व्यक्ति तो पहले से ही मरा हुआ होता है पर उससे भी पहले वह व्यक्ति मर जाता है, जिसके पास माँगनेवाला व्यक्ति आता है और सामान होने के बावजूद दूसरे व्यक्ति के मुख से नहीं है जैसा वाक्य निकलता है।

तो ये थे Rahim Ke Dohe Ke Arth रहीम के दोहे के अर्थ।